Monday, February 15, 2016

वो जो हममे तुममे क़रार था Vo jo humme tumme qaraar thaa

वो जो हममे तुममे क़रार था तुम्हें याद हो के ना याद हो
वही यानी वादा निभाः का तुम्हें याद हो के ना याद हो

कोई बात ऐसी अगर हुई के तुम्हारे जी को बुरी लगी
तो बयाँ से पहले ही भूलना तुम्हें याद हो के न याद हो

सुनो ज़िक्र है कई साल का कोई वादा मुझ से था आप का
वो निभाने का तो ज़िक्र क्या तुम्हें याद हो के न याद हो

वो नये गिलहे वो शिकायतें वो मज़े-मज़े की हिकायतें
वो हर एक बात पे रूठना तुम्हें याद हो के न याद हो

कभी हम में तुम में भी चाह थी कभी हम से तुम से भी राह थी
कभी हम भी तुम भी थे आश्ना तुम्हें याद हो के न याद हो

हुए इत्तेफ़ाक़ से गर बहम वो वफ़ा जताने को दम-ब-दम
गिला-ए-मलामत-ए-अर्क़बा तुम्हें याद हो के न याद हो

वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे बेश्तर वो करम के था मेरे हाल पर
मुझे सब है याद ज़रा-ज़रा तुम्हें याद हो के न याद हो

कभी बैठे सब में जो रू-ब-रू तो इशारतों ही से गुफ़्तगू
वो बयान शौक़ का बरमला तुम्हें याद हो के न याद हो

की बात मैंने वो कोठे की मेरे दिल से साफ़ उतर गई
तो कहा के जाने मेरी बला तुम्हें याद हो के न याद हो

वो बिगड़ना वस्ल की रात का वो न मानना किसी बात का
वो नहीं-नहीं की हर आन अदा तुम्हें याद हो के न याद हो

जिसे आप कहते थे बावफ़ा जिसे आप गिनते थे आश्ना

मैं वही हूँ “मोमिन”-ए-मुब्तला तुम्हें याद हो के न याद हो